कार्यक्रम – भारतीय भाषा मंच शुभारम्भ एवं संगोष्ठी
तिथि. मार्गशीर्ष शुक्ल
पक्ष दशमी विक्रमी संवत २०७२ तदनुसार २० दिसम्बर २०१५
स्थान. आजाद भवन : भारतीय सांस्कृतिक संबन्ध परिषद्, नई दिल्ली
भारतीय भाषाओं की
चिंताजनक स्थितिए दशा एवं दिशा पर देश भर में गंभीर चिंतन एवं चर्चा के बाद
विभिन्न भाषाओं के विद्वानोंए बुद्धिजीवियों की ओर से यह सुझाव आया इस क्षेत्र में
व्यापक सुधारों को वास्तविक रूप प्रदान करने के समन्वित प्रयास के रूप मे भारतीय
भाषा मंच का गठन किया जाये।
इसी क्रम में दिनांक .२०-१२-२०१५ को आज़ाद भवन
प्रेक्षागृह, नई दिल्ली में
१५ राज्यों से आये १७ भाषाओँ के प्रतिनिधियों द्वारा भारतीय भाषा मंच का औपचारिक
गठन हुआ।
इस मंच के कुछ प्रमुख
उद्देश्य इस प्रकार हैं---
१.भारतीय भाषाओं की
वर्तमान स्थिति तथा उसमें सुधार के उपाय ।
२.भारतीय भाषाओं को संवैधानिक
व्यवस्था के अनुसार, अपेक्षित स्थान
पर प्रतिष्ठापित कराना तथा रोजगार से जोड़ना ।
३.केंद्र में हिंदी और
राज्यों में उनकी राजभाषाओं के प्रयोग को
बढ़ाने के लिए अभियान चलाना एवं जन-जागरण करना।
४.भारतीय भाषाओं के लिए
काम करने वाले सभी व्यक्तियों, भाषा-प्रेमियों और संस्थाओं को एक मंच पर लाना तथा उनके मध्य
सौहार्द एवं समन्यव स्थापित करना ।
५.केंद्र और राज्यों की
राजभाषा नीति और नियमों के अनुसार
सरकारी काम-काज में हिंदी और
प्रादेशिक भाषाओं का प्रयोग किये जाने के लिए सरकारों से आग्रह करना व आवश्यकता
पड़ने पर दबाब बनाना, राजभाषा
अधिनियमों और नियमों को कड़ाई से लागू
कराना ।
6.प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चशिक्षा में चिकित्सा और तकनीकी सहित सभी स्तरों पर शिक्षा
का माध्यम भारतीय भाषाएँ हों, ---इस दिशा में प्रयास करना ।
७.छोटी-बड़ी सभी प्रतियोगी और भर्ती परीक्षाओं का माध्यम हिंदी और भारतीय भाषाओं को बनवाना एवं अंग्रेजी के अनिवार्य प्रश्न पत्र को
हटवाना ।
८.विधि, न्याय और प्रशासन, सूचना प्रोद्योगिकी ( ई.गवर्नेंस) डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन सेवा आदि उद्योग और व्यापार के
क्षेत्र में भारतीय भाषाओं के प्रयोग को
बढ़ाना/बढ़वाना।
९.उच्चतम न्यायालय में
हिन्दी और उच्च न्यायालयों में राज्य की राजभाषाओं के प्रयोग की अनुमति दिए जाने हेतु प्रयास करना ।
१०.भारतीय भाषाओं से संबंधित उन सभी बिन्दुओं पर विचार जो भारतीय भाषाओं के
सम्वर्धन के लिए आवश्यक हैं।
इस मंच के राष्ट्रीय
संयोजक श्री वृषभ जैन ने भारतीय भाषाओं की स्थिति एवं मंच की संकल्पना का परिचय
देते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं पर काम करने वाली देश में अनेक संस्थाएँ हैं, अब एक और नर्इ
संस्था के रूप में एक नए भारतीय भाषा मंच की जरूरत क्यों?........ इस प्रश्न के
उत्तर में यह बात उभरी कि हमारी सभी भारतीय भाषाएँ हमारी पहचान हैं और वह पहचान
निरन्तर तिरोहित होती जा रही है। उनका स्थान दोयम से, तीसरे और चौथे पर पहुँचता जा रहा है। यह न भाषाओं के हित
में है और न भाषा-प्रयोक्ताओं के। उनका निरन्तर क्षरण हो रहा है, प्रतिदिन हमारे शब्द कम होते जा रहे हैं। हमारी
भारतीय भाषाओं को लेकर कुछ-कुछ आन्दोलन पहले भी हुए, परन्तु वे
कुछ-कुछ भाषाओं के संदर्भ में ही हुए तथा भाषाओं के कुछ-कुछ पक्षों को लेकर हुए, पर ऐसा कोर्इ मंच
नहीं बना, जो समस्त भारतीय
भाषाओं के सभी पक्षों की चिन्ता करता हो। सभी भारतीय भाषाएँ हमारी राष्ट्रीय
भाषाएँ हैं, अखण्ड भारत की एक संस्कृति की भाषाएँ हैं। इन सब को समृद्ध करने के लिए सरकारी और
सामाजिक दोनो स्तरों पर हमें काम करने की आवश्यकता है। यह मंच उस रूप में आगे
बढ़ने के लिए संकल्पित है। यह मंच
पूरी तरह स्वायत्त रहेगा और इसमें निरन्तर इस बात पर ध्यान रखा जाएगा कि कोर्इ भी
राजनीति प्रवेश न करे।
तत्पश्चात श्री चंद्रभूषण
शर्मा : निदेशक राष्ट्रीय
मुक्त विद्यालयी संस्थान ने त्रिभाषा सूत्र, विद्यालयी शिक्षा में भाषाओँ के महत्व, संस्कृत की स्थिति एवं उपादेयता आदि विषयों पर विस्तृत
प्रकाश डाला; उसके बाद
तमिलनाडु से पधारे श्रीमान पेरूमल जी ने भाषाओ के समेकन पर प्रकाश डाला तथा समझाया
कि भारतीय भाषाओँ में परस्पर विरोध नहीं, वरन एकत्व का भाव है।
माखनलाल चतुर्वेदी
पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति श्रीमान् कुठियाला जी ने इस तथ्य पर प्रकाश
डाला कि किस प्रकार विदेशों में मातृभाषा पर ही जोर दिए जाने से वे देश उन्नति के
मार्ग पर अग्रसर हो पाए, वहीं हमारे देश में अपनी भाषा के प्रति पूर्वाग्रह
ने विकास को अवरुद्ध कर दिया।
विश्वविद्यालय अनुदान
आयोग की सदस्य सचिव श्रीमती पंकज मित्तल ने
बताया कि किस प्रकार विश्वविद्यालय अनुदान
आयोग ने भारतीय भाषाओं के विकास के लिए
नवीन पहल की है।
वहीं केरल से पधारे श्री विनोद जी ने सभी लोगों से भाषायी आन्दोलन खड़ा करने की अपील
की।
इसके बाद कार्यक्रम में पधारे सभी भाषाओं के
प्रतिनिधियों ने अपने-अपने विचार भी रखे
और अब भारत के विभिन्न राज्यों में मंच की विभिन्न इकाइयाँ गठित जाएँगी।
अंत में भारतीय भाषा मंच
के संरक्षक एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री अतुल कोठारी जी ने इस बात को समझाया कि
देश को बदलना है[, तो शिक्षा को बदलना होगा ।
और यदि शिक्षा को बदलना
है, तो भाषा को बदलना होगा।
उन्होंने कहा कि चर्चा
समस्या की नहीं, बलि्क समाधान की होनी
चाहिए, जिसकी शुरुआत
स्वयं से करनी होगी, प्रयास
व्यक्तिगत रूप से होते हुए व्यापक सामाजिक जन-जागरण का होना चाहिए।
अंग्रेजी के मिथक को
तोड़ने के लिए वैकल्पिक तैयारी करनी होगी यथा स्वदेशी पुस्तकों का लेखनए कानूनी
संघर्ष प्रशासनिक क्षेत्र में निजी व सामूहिक प्रयास स्वदेशी भाषाओँ का प्रोत्साहन
आदि।
अंत में अतुल जी ने सभी
से यह संकल्प लेने को कहा कि सभी अपने-अपने स्तर पर प्रयास
करते हुए इस आन्दोलन को सार्थक बनायें। लोग कहते हैं कि
पुस्तकें नहीं हैं, भाषाओं पर काम करने वाले लोग नहीं हैं, सब ओर अंधकार हैं, आदि आदि, पर मुझे लगता है
कि जब हम काम करने लगेंगे, तो भाषाओं के दीप जलने लगेंगे, और तब अन्धकार
अपने आप दूर भगेगा और सब ओर प्रकाश दिखने लगेगा।
जय हिन्द
Mr. Prasaad,
ReplyDeleteI prefer nuktaa ,shirorekha ,anusvar ,chandrabindu, long U,short i and dandaa/full stop free translatable and transliteratable global Hindi.
This type of Hindi is spell checker free , easy to teach ,learn read ,understand and transliterate in write as you pronounce scheme.
Don't this type of Hindi maintain all sounds needed in speech?
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भारतीय भाषा मन्च Bhaaratiiya Bhaashaa Manch
कार्यक्रम – भारतीय भाषा मन्च शुभारम्भ एवन् सन्गोष्ठी
तीथी. मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष दशमी वीक्रमी सन्वत २०७२ तदनुसार २० दीसम्बर २०१५
स्थान. आजाद भवन : भारतीय साॅस्कृतीक सन्बन्ध परीषद्, नई दील्ली
भारतीय भाषाऑ की चीन्ताजनक स्थीतीए दशा एवन् दीशा पर देश भर मॅ गन्भीर चीन्तन एवन् चर्चा के बाद वीभीन्न भाषाऑ के वीद्वानॉए बुद्धीजीवीयॉ की ओर से यह सुझाव आया इस क्षेत्र मॅ व्यापक सुधारॉ को वास्तवीक रुप प्रदान करने के समन्वीत प्रयास के रुप मे भारतीय भाषा मन्च का गठन कीया जाये।
इसी क्रम मॅ दीनाॅक .२०-१२-२०१५ को आज़ाद भवन प्रेक्षागृह, नई दील्ली मॅ १५ राज्यॉ से आये १७ भाषाओॅ के प्रतीनीधीयॉ द्वारा भारतीय भाषा मन्च का औपचारीक गठन हुआ।
इस मन्च के कुछ प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार है---
१.भारतीय भाषाऑ की वर्तमान स्थीती तथा उसमॅ सुधार के उपाय ।
२.भारतीय भाषाऑ को सन्वैधानीक व्यवस्था के अनुसार, अपेक्षीत स्थान पर प्रतीष्ठापीत कराना तथा रोजगार से जोड़ना ।
३.कॅद्र मॅ हीन्दी और राज्यॉ मॅ उनकी राजभाषाऑ के प्रयोग को बढ़ाने के लीए अभीयान चलाना एवन् जन-जागरण करना।
४.भारतीय भाषाऑ के लीए काम करने वाले सभी व्यक्तीयॉ, भाषा-प्रेमीयॉ और सन्स्थाऑ को एक मन्च पर लाना तथा उनके मध्य सौहार्द एवन् समन्यव स्थापीत करना ।
५.कॅद्र और राज्यॉ की राजभाषा नीती और नीयमॉ के अनुसार सरकारी काम-काज मॅ हीन्दी और प्रादेशीक भाषाऑ का प्रयोग कीये जाने के लीए सरकारॉ से आग्रह करना व आवश्यकता पड़ने पर दबाब बनाना, राजभाषा अधीनीयमॉ और नीयमॉ को कड़ाई से लागु कराना ।
6.प्राथमीक, माध्यमीक, उच्चशीक्षा मॅ चीकीत्सा और तकनीकी सहीत सभी स्तरॉ पर शीक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएॅ हॉ, ---इस दीशा मॅ प्रयास करना ।
७.छोटी-बड़ी सभी प्रतीयोगी और भर्ती परीक्षाऑ का माध्यम हीन्दी और भारतीय भाषाऑ को बनवाना एवन् अन्ग्रेजी के अनीवार्य प्रश्न पत्र को हटवाना ।
८.वीधी, न्याय और प्रशासन, सुचना प्रोद्योगीकी ( ई.गवर्नॅस) डीजीटल इन्डीया और ऑनलाइन सेवा आदी उद्योग और व्यापार के क्षेत्र मॅ भारतीय भाषाऑ के प्रयोग को बढ़ाना/बढवाना।
९.उच्चतम न्यायालय मॅ हीन्दी और उच्च न्यायालयॉ मॅ राज्य की राजभाषाऑ के प्रयोग की अनुमती दीए जाने हेतु प्रयास करना ।
१०.भारतीय भाषाऑ से सन्बन्धीत उन सभी बीन्दुऑ पर वीचार जो भारतीय भाषाऑ के सम्वर्धन के लीए आवश्यक है।
इस मन्च के राष्ट्रीय सन्योजक श्री वृषभ जैन ने भारतीय भाषाऑ की स्थीती एवन् मन्च की सन्कल्पना का परीचय देते हुए कहा की भारतीय भाषाऑ पर काम करने वाली देश मॅ अनेक सन्स्थाएॅ है, अब एक और नर्इ सन्स्था के रुप मॅ एक नए भारतीय भाषा मन्च की जरुरत क्यॉ?........ इस प्रश्न के उत्तर मॅ यह बात उभरी की हमारी सभी भारतीय भाषाएॅ हमारी पहचान है और वह पहचान नीरन्तर तीरोहीत होती जा रही है। उनका स्थान दोयम से, तीसरे और चौथे पर पहुॅचता जा रहा है। यह न भाषाऑ के हीत मॅ है और न भाषा-प्रयोक्ताऑ के। उनका नीरन्तर क्षरण हो रहा है, प्रतीदीन हमारे शब्द कम होते जा रहे है। हमारी भारतीय भाषाऑ को लेकर कुछ-कुछ आन्दोलन पहले भी हुए, परन्तु वे कुछ-कुछ भाषाऑ के सन्दर्भ मॅ ही हुए तथा भाषाऑ के कुछ-कुछ पक्षॉ को लेकर हुए, पर ऐसा कोर्इ मन्च नही बना, जो समस्त भारतीय भाषाऑ के सभी पक्षॉ की चीन्ता करता हो। सभी भारतीय भाषाएॅ हमारी राष्ट्रीय भाषाएॅ है, अखण्ड भारत की एक सन्स्कृती की भाषाएॅ है। इन सब को समृद्ध करने के लीए सरकारी और सामाजीक दोनो स्तरॉ पर हमॅ काम करने की आवश्यकता है। यह मन्च उस रुप मॅ आगे बढने के लीए सन्कल्पीत है। यह मन्च पुरी तरह स्वायत्त रहेगा और इसमॅ नीरन्तर इस बात पर ध्यान रखा जाएगा की कोर्इ भी राजनीती प्रवेश न करे।
तत्पश्चात श्री चन्द्रभुषण शर्मा : नीदेशक राष्ट्रीय मुक्त वीद्यालयी सन्स्थान ने त्रीभाषा सुत्र, वीद्यालयी शीक्षा मॅ भाषाओॅ के महत्व, सन्स्कृत की स्थीती एवन् उपादेयता आदी वीषयॉ पर वीस्तृत प्रकाश डाला; उसके बाद तमीलनाडु से पधारे श्रीमान पेरुमल जी ने भाषाओ के समेकन पर प्रकाश डाला तथा समझाया की भारतीय भाषाओॅ मॅ परस्पर वीरोध नही, वरन एकत्व का भाव है।
Here is a rest of article.
Deleteमाखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारीता वीश्ववीद्यालय के कुलपती श्रीमान् कुठीयाला जी ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला की कीस प्रकार वीदेशॉ मॅ मातृभाषा पर ही जोर दीए जाने से वे देश उन्नती के मार्ग पर अग्रसर हो पाए, वही हमारे देश मॅ अपनी भाषा के प्रती पुर्वाग्रह ने वीकास को अवरुद्ध कर दीया।
वीश्ववीद्यालय अनुदान आयोग की सदस्य सचीव श्रीमती पन्कज मीत्तल ने बताया की कीस प्रकार वीश्ववीद्यालय अनुदान आयोग ने भारतीय भाषाऑ के वीकास के लीए नवीन पहल की है।
वही केरल से पधारे श्री वीनोद जी ने सभी लोगॉ से भाषायी आन्दोलन खड़ा करने की अपील की।
इसके बाद कार्यक्रम मॅ पधारे सभी भाषाऑ के प्रतीनीधीयॉ ने अपने-अपने वीचार भी रखे और अब भारत के वीभीन्न राज्यॉ मॅ मन्च की वीभीन्न इकाइयाॅ गठीत जाएॅगी।
अन्त मॅ भारतीय भाषा मन्च के सन्रक्षक एवन् कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री अतुल कोठारी जी ने इस बात को समझाया की
देश को बदलना है[, तो शीक्षा को बदलना होगा ।
और यदी शीक्षा को बदलना है, तो भाषा को बदलना होगा।
उन्हॉने कहा की चर्चा समस्या की नही, बली्क समाधान की होनी चाहीए, जीसकी शुरुआत स्वयन् से करनी होगी, प्रयास व्यक्तीगत रुप से होते हुए व्यापक सामाजीक जन-जागरण का होना चाहीए।
अन्ग्रेजी के मीथक को तोड़ने के लीए वैकल्पीक तैयारी करनी होगी यथा स्वदेशी पुस्तकॉ का लेखनए कानुनी सन्घर्ष प्रशासनीक क्षेत्र मॅ नीजी व सामुहीक प्रयास स्वदेशी भाषाओॅ का प्रोत्साहन आदी।
अन्त मॅ अतुल जी ने सभी से यह सन्कल्प लेने को कहा की सभी अपने-अपने स्तर पर प्रयास करते हुए इस आन्दोलन को सार्थक बनायॅ। लोग कहते है की पुस्तकॅ नही है, भाषाऑ पर काम करने वाले लोग नही है, सब ओर अन्धकार है, आदी आदी, पर मुझे लगता है की जब हम काम करने लगॅगे, तो भाषाऑ के दीप जलने लगॅगे, और तब अन्धकार अपने आप दुर भगेगा और सब ओर प्रकाश दीखने लगेगा।
जय हीन्द
प्रियवर
Deleteआपके सुझाये गए हिन्दी के उद्धरण से यह स्पष्ट है कि हिन्दी उच्चारण की सभी ध्वनियाँ उसमें सुरक्षित नहीं रह पा रही हैं, अतः लिप्यंकन की पारम्परिक पद्धति ही हमें सीखनी चाहिए, आपके द्वारा सुझाया गया रूप हिंदी अधिगम की प्रक्रिया का एक रूप तो हो सकता है, पर चरम रूप नहीं।
आपका
वृषभ प्रसाद जैन